Monday, March 25, 2019

क्या सिंगापुर दुनिया का सबसे सुरक्षित शहर है?

वर्ष 2019 में सिंगापुर अपना द्विशताब्दी समारोह मना रहा है लेकिन उसके नागरिक देश के उन तीन मूल्यों पर मनन कर रहे हैं जिसमें इस आधुनिक देश की नींव रखी है- खुलापन, बहुसंस्कृतिवाद और आत्मनिर्णय का अधिकार.

वर्ष 2015 में सिंगापुर ने अपनी स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ मनाई और इस साल अगले समारोह की तैयारी में यह देश जुट गया. वर्ष 2019 में सिंगापुर का द्विशताब्दी समारोह अलग-अलग स्थानों पर कई तरह से मनाया जा रहा है. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करने वाले सर स्टैमफ़ोर्ड रैफल्स ने सिंगापुर को कंपनी के एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में 200 साल पहले स्थापित किया था.

सिंगापुर एक अलग पहचान वाला देश है.

50वीं सालगिरह वाले समारोहों से अलग द्विशताब्दी वर्ष को एक यादगार के रूप में मनाया जा रहा है. इस द्विपीय देश पर ब्रिटिश हुकूमत की छाया रही है और कई स्थानीय निवासी इस बात को लेकर नाखुश हैं कि इसका समारोह क्यों मनाया जा रहा है.

लेकिन द्विशताब्दी समारोह आयोजन कार्यालय का कहना है कि इसका उद्देश्य नागरिकों को अपने अतीत पर मनन करने का अवसर देना है. 700 वर्षों के औपनिवेशिक अतीत के उन मूल्यों पर विचार करना है जिसमें आधुनिक देश को आकार दिया है.

खुलेपन, बहुसंस्कृतिवाद तथा आत्मनिर्णय के मूल्यों को द्विशताब्दी समारोह आयोजन कार्यालय ने ही चुना है. यहां रहने वाले बहुत सारे नागरिक इन्हीं मूल्यों से प्यार करते हैं.

वे कहते हैं, "सिंगापुर एक अलग पहचान वाला देश है. यहां की जातीयता और धर्म में विविधता है जो सामाजिक ताने-बाने के साथ-साथ भोजन और यहां की पहचान वाले स्मारकों में भी दिखती है. इस विविधता के बावजूद हम अपनी बोलचाल और अपने मूल्यों तथा जीवन के हर क्षेत्र से आने वाले लोगों को अपना मानने की एक समान विचारधारा रखते हैं."

सिंगापुर की सांस्कृतिक विविधता के बावजूद यह देश अब भी समलैंगिकता को लेकर विकास के प्रारम्भिक चरण में है. ब्रिटेन का उपनिवेश होने से लेकर अब तक सिंगापुर में समलैंगिकता पर प्रतिबंध लगाए रखा है. द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, भारत में ऐसे ही औपनिवेशिक नियम को समाप्त करने के बाद हालांकि इसे अक्सर न्यायालयों में चुनौती दी गई है और हाल में ही 2019 में नया मुकदमा भी शुरू किया गया है.

सिंगापुर में समलैंगिक संबंधों को क़ानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है और न ही कोई समलैंगिक जोड़ा किसी बच्चे को अपना सकता है, लेकिन सालाना रूप से मनाए जाने वाले पिंक डॉट रैली जैसे अवसरों पर कार्यकर्ता इस संबंध में जागरूकता फैलाने और बदलाव लाने की पुरजोर कोशिश करते हैं.

यहां की विविध संस्कृति नवागंतुकों, विशेष रूप से पश्चिमी देशों के नागरिकों को जल्दी से यहां घुलने-मिलने का अवसर देती है. तीन वर्ष से सिंगापुर में रहने वाली और अ मेडेन वॉयेजर नामक यात्रा वृत्तांत लिखने वाली अमरीकी एलेक्जेंड्रा फेग बताती हैं, "यह भौगोलिक रूप से भी और सांस्कृतिक रूप से भी एशिया का प्रवेश द्वार है. बाली और बोराके जैसे दूरदराज़ के स्थानों की यात्रा करने के लिए यह एक उचित स्थान है.

पश्चिम से सिंगापुर का संबंध बहुत गहरा है और यहां ब्रिटेन का खासा प्रभाव देखा जा सकता है. ब्रिटिश शैली की दुकानों के साथ ही आप बौद्ध मंदिर भी देख सकते हैं और स्थानीय खेलों पर आपको चीन के हेनान प्रांत का चिकेन राइस तो मिलेगा ही साथ ही इंडोनेशियाई नासी गोरेंग यानी प्राइड राइस भी मिलेगा और बगल में ही हैमबर्गर जैसा पश्चिमी खाना भी दिखाई देगा."

लेकिन आप इन छोटी दुकानों पर बिकने वाले खाने को ऐसा-वैसा न समझिए. सिंगापुर में आंशिक रूप से निवास करने वाले तथा हाउ आई ट्रैवेल के संपादक कनाडा के जॉर्डन विशप बताते हैं, "सिंगापुर के ऐसे ही दो फूड स्टॉल यानी खाने की दुकानों को मिशेल इन स्टार का सम्मान प्रदान किया गया है."

लियाओ फान हाँगकाँग सोया सॉस चिकेन राइस एंड नूडल तथा हिल स्ट्रीट ताई ह्वा पॉर्क नूडल नामक इन दो दुकानों को 2016 में यह सम्मान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला.

हर हफ्ते कुछ नए रेस्तराँ और बार खुलते ही जा रहे हैं. ऐसे में सिंगापुर का अतीत आज भी यहां के खाने की विभिन्नता में झलकता है। यहां आपको चीन, मलय, भारतीय, पेरानाकान, जर्मन, इतालवी, जापानी, वियतनामी, फ्रांसीसी और अमरीकन भोजन मिल जाएगा.

यह बहुसंस्कृतिवाद खाने तक ही सीमित नहीं है. इस मिश्रण को स्थानीय भाषा में भी देखा जा सकता है. हालांकि, हाल में सरकार ने तेजी से कदम उठाते हुए इसके उपयोग को कुछ कम करने की कोशिश की है लेकिन अंग्रेजी, मंदारिन, हॉकियन, कैंटोनीस, मलय तथा तमिल को मिलाजुला कर बनी सिंगलिश भाषा का स्थानीय लोग कॉफी मंगाने या गप्पबाजी करने में काफी प्रयोग करने लगे हैं.

Wednesday, March 20, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: क्या भारत में बेरोज़गारी बढ़ रही है?

जब बीजेपी सरकार ने साल 2014 में सत्ता संभाली थी तो भारत में रोज़गार पैदा करना सरकार की योजनाओं का मुख्य हिस्सा था.

इस संबंध में आधिकारिक रूप से प्रकाशित आंकड़े बहुत सीमित हैं, लेकिन लीक हुए बेरोज़गारी के आंकड़ों ने भारत में रोज़गार की स्थिति को लेकर एक ज़बरदस्त बहस छेड़ दी है.

​विपक्षी दल कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने सरकार पर नौकरी से जुड़े अपने वादे पूरे न करने का आरोप लगाया है.

तो क्या बेरोज़गारी बढ़ी है?

11 अप्रैल को होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए, बीबीसी रियलिटी चेक प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा किए गए दावों और वादों की पड़ताल कर रहा है.

ये विवाद तब शुरू हुआ जब एक स्थानीय मीडिया ने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के लीक हुए एक अध्ययन के हवाले से बताया कि भारत में बेरोज़गारी दर अपने चार दशकों के सबसे उच्च स्तर 6.1% पर पहुंच गई है.

एनएसएसओ बेरोज़गारी का आकलन करने सहित देश में कई बड़े सर्वेक्षण करता है.

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) के कार्यकारी अध्यक्ष ने ​विरोध करते हुए इस्तीफ़ा दे दिया और इन आंकड़ों की पुष्टि भी की.

लेकिन, सरकार की ओर से कहा गया कि ये अध्ययन सिर्फ़ एक मसौदा है. रोज़गार संकट को लेकर दिए गए सुझावों को भी ख़ारिज कर दिया गया. साथ ही आर्थिक विकास बढ़ने के संकेत दिए.

इसके बाद 100 से ज़्यादा अर्थशास्त्रियों और समाज विज्ञान के प्रोफ़ेसरों ने एक खुला पत्र लिखकर दावा किया था कि भारत की आंकड़े जुटाने वाली संस्थाएं ''संदेह के घेरे में आ गई हैं क्योंकि वो न सिर्फ़ दबाव में बल्कि राजनीतिक नियंत्रण में काम कर रही हैं.''

आख़िरी एनएसएसओ सर्वेक्षण साल 2012 में आया था.

इसके बाद से सर्वेक्षण आए बहुत समय हो चुका है क्योंकि दशकों से आ रहा ये सर्वेक्षण आना बंद हो गया था.

साल 2012 में बेरोज़गारी का आंकड़ा 2.7% था.

क्या इन दो सर्वेक्षणों की तुलना हो सकती है?
लीक हुई इस नई रिपोर्ट को देखे बिना उसकी साल 2012 में आए आख़िरी सर्वेक्षण से तुलना करना मुश्किल है और इसलिए ये भी पता लगाना भी मुश्किल है कि बेरोज़गारी 40 साल की ऊंचाई पर है या नहीं.

हालांकि, अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू को दिए एक साक्षात्कार में सांख्यिकी आयोग के एक पूर्व अध्यक्ष ने कहा था, ''दोनों के तरीक़े एक जैसे हैं और उनकी तुलना करने में कोई समस्या नहीं है.''

अंतरराष्ट्रीय श्रम संस्थान के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में साल 2012 और 2014 के बीच बेरोज़गारी कम हुई है लेकिन 2018 में 3.5% तक बढ़ी है.

हालांकि, यह सिर्फ़ 2012 के एनएसएसओ सर्वेक्षण पर आधारित एक अनुमान है.

साल 2010 से भारतीय श्रम मंत्रालय ने अपनी कार्यप्रणाली के आधार पर घरेलू सर्वेक्षण करना शुरू कर दिया था. 2015 में आख़िरी बार हुआ सर्वेक्षण 5% बेरोज़गारी दर दिखाता है और यह दर पिछले कुछ सालों में बढ़ी है.

उनके आंकड़ों के अनुसार शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की बेरोज़गारी का आंकड़ा अधिक है.

एक भारतीय थिंक टैंक कहता है कि यह आंकड़ा बढ़ रहा है.

मुंबई आधारित एक थिंक टैंक सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इको​नॉमी (सीएमआईई) के मुताबिक़ पिछले साल फ़रवरी में बेरोज़गारी दर 5.9% से 7.2% पर पहुंच गई थी.

यह संस्थान अपना ख़ुद का सर्वेक्षण करता है. हालांकि, इसका सर्वेक्षण एनएसएसओ के मुक़ाबले छोटे पैमाने पर होता है.

रोज़गार बाज़ार को मापने का एक और तरीक़ा श्रम भागीदारी दर है. इसका मतलब है, रोज़गार चाहने वाली 15 साल से अधिक आयु वर्ग की कार्यशील आबादी का अनुपात.

सीएमआईई के प्रमुख महेश व्यास कहते हैं, ''साल 2016 में श्रम भागीदारी का 47—48 प्रतिशत आंकड़ा अब गिरकर 43 प्रतिशत पर आ गया है. इसका मतलब है कि पांच प्रतिशत कार्यशील आबादी श्रम बल से बाहर हो गई है.''

वह कहते हैं कि इसके पीछे बेरोज़गारी और नौकरी को लेकर असंतुष्टि कारण हो सकते हैं.

भारत में नौकरियों को प्रभावित करने वाले कारक
2016 में, भारत में भ्रष्टाचार और अवैध नग़दी पर रोक के लिए 500 और 1000 रुपये के नोटों पर प्रतिबंध लगाया गया था. इस प्रक्रिया को विमुद्रीकरण कहते हैं. इसे आम तौर पर नोटबंदी भी कहा जाता है.

एक विश्लेषण के मुताबिक़ नोटबंदी के कारण कम से कम 35 करोड़ नौकरियां गई हैं और इससे श्रम बल में युवाओं की भागीदारी पर असर पड़ा है.

'मेक इन इंडिया' जैसी पहलों के माध्यम से देश चीन और ताइवान जैसे विनिर्माण केंद्रों का अनुकरण करने की कोशिश कर रहा है ताकि महंगे आयात में कमी आए, तकनीकी आधार विकसित हो और नौकरियां पैदा हों.

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि ढांचागत बाधाएं, जटिल श्रम क़ानून और नौकरशाही ने प्रगति के रास्ते को रोक दिया है.

अर्थशास्त्री जिस एक और कारक की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं, वो है भारत में बढ़ता मशीनीकरण.

अर्थशास्त्री विवेक कॉल कहते हैं, ''अगर कोई कंपनी भारत में विस्तार करना चाहती है, तो वो कर्मचारी रखने की बजाए मशीनों के इस्तेमाल को प्राथमिकता देती है.''

Thursday, March 7, 2019

पुरुषों से तेज़ थीं, इसलिए रोक दी महिलाओं की रेस

बेल्जियम में होने वाली महिलाओं की एक ख़ास रेस को कुछ वक्त के लिए सिर्फ़ इसलिए रोक दिया गया क्योंकि इसमें शिरकत करने वाली निकोल हेनस्लमन पुरुष प्रतिस्पर्धियों के काफी नज़दीक पहुंच गई थीं.

ये रेस बीते शनिवार को हुई थी और इसका आयोजन ओमलूप हेट न्यूज़ब्लाद नाम की संस्था ने किया था.

संस्था के रेस मार्शल ने निकोल को 35 किलोमीटर के बाद उस वक्त रोक लिया जब वो तेज़ी से बढ़त लेते हुए पुरुष प्रतिस्पर्धियों के पास पहुंचने वाली थीं.

हेनस्लमन की स्पीड को काफ़ी तेज़ माना गया. इस रेस में शामिल होने वाले पुरुषों को महिलाओं से दस मिनट पहले ही आगे जाने दिया. इसके बावजूद 123 किलोमीटर की इस रेस में निकोल उनके काफी करीब आ गईं.

जब निकोल को रोका गया तब वो महिला प्रतिभागियों से दो मिनट आगे निकल गईं थीं. उन्हें कहा गया कि वो कुछ देर इंतज़ार करें ताकि पुरुषों के लिए हो रही रेस में शामिल होने वाले आगे निकल सकें.

'ये आपके लिए मौक़े कम करने वाली बात हुई'
साइकलिंग न्यूज़ नाम की वेबसाइट को निकोल ने बताया "हम देख सकते थे कि आगे पुरुषों की रेस में शामिल होने वाले एंबुलेंस थे. मुझे लगता है कि हमें पांच-सात मिनट तक रुकना पड़ा और इस कारण हमारे लिए मौक़े कम हुए."

इसके बाद जब महिला प्रतिभागी निकोल के नज़दीक आईं तो उन्हें फिर से रेस शुरू करने की इजाज़त दी गई लेकिन रुकने का ख़ामियाज़ा निकोल को भुगतना पड़ा. वो फिर अपनी पुरानी गति नहीं पकड़ पाईं और 74वें स्थान पर आईं. रेस में पहला स्थान चन्ताल ब्लैक को मिला.

निकोल कहती हैं, "हम पुरुषों के काफी नज़दीक थे इस कारण उनसे दूरी बनाए रखने के लिए हमें रोका गया."

"मेरे लिए ये बुरा हुआ क्योंकि मैं अच्छे मूड में थी और मेरा प्रदर्शन अच्छा हो रहा था. लेकिन फिर उन्होंने मुझे रोक दिया और मेरे प्रतिद्वंद्वियों को मुक़ाबला करने की नई ताकत मिल गई."

लेकिन इसके बाद निकोल ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर मज़ाक करते हुए लिखा, "शायद मैं और मेरे साथ की अन्य महिलाएं ज़्यादा तेज़ थीं या फिर कहें कि पुरुष काफी स्लो थे."