Tuesday, February 26, 2019

भारतीय वायु सेना के हमले के वायरल वीडियो का सच

सोशल मीडिया समेत कई बड़े भारतीय टीवी न्यूज़ चैनलों पर दिखाया जा रहा 'पाकिस्तान में तथाकथित भारतीय एयरस्ट्राइक' का वीडियो 26 फ़रवरी की सुबह का नहीं, बल्कि पुराना है.

इस वीडियो को शेयर करने वालों ने दावा किया है कि किस तरह भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में जाकर जैश- ए-मोहम्मद के बड़े कैंप को तबाह किया.

भारत के विदेश सचिव विजय गोखले ने मंगलवार सुबह प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर भारतीय वायु सेना के इस कथित ख़ुफ़िया मिशन की जानकारी दी.

उन्होंने कहा, "भारत सरकार को विश्वसनीय सूचना मिली थी कि जैश- ए-मोहम्मद देश के दूसरे हिस्सों में आत्मघाती हमले करने की कोशिश कर रहा था. इसलिए मंगलवार तड़के भारत ने बालाकोट में जैश के सबसे बड़े ट्रेनिंग कैंप को निशाना बनाया."

इन हैशटैग्स के साथ फ़ाइटर विमानों द्वारा कथित बमबारी का जो एक वीडियो शेयर किया जा रहा है और टीवी पर दिखाया जा रहा है, वो पाकिस्तान के सोशल मीडिया यूज़र्स के अनुसार 22 सितंबर 2016 का है.

सितंबर 2016 में यू-ट्यूब पर पोस्ट किए गए इस वीडियो को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद का बताया गया है.

वीडियो में कुछ फ़ाइटर विमान इस्लामाबाद शहर के ऊपर गश्त करते दिखाई देते हैं और इसी दौरान इनमें से एक विमान 'लाइट फ़्लेयर' छोड़ता है.

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर के 22 सितंबर 2016 के ट्वीट से पाकिस्तान की वायु सेना के विमानों द्वारा इस्लामाबाद शहर के ऊपर गश्त करने की पुष्टि होती है.

सितंबर 2016 की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब 18 सिंतबर 2016 को हुए उड़ी हमले के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते तल्ख़ होते दिख रहे थे, तब पाकिस्तान की वायु सेना ने भारत की ओर से किसी हमले की आशंका में इस्लामाबाद और उसके क़रीब फ़ाइटर विमानों की लैंडिग का अभ्यास किया था.

इस अभ्यास के दौरान पाकिस्तानी वायु सेना के विमानों को लाहौर-इस्लामाबाद हाइवे पर उतारने की प्रैक्टिस भी की गई थी.

दूसरा वीडियो
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद ज़िया उल-हक के बेटे इजाज़ उल-हक ने 24 फ़रवरी 2019 की सुबह 10 बजे ट्वीट किया था, "बीती रात मैंने फ़ोर्ट अब्बास इलाक़े में सवा दो बजे दो फ़ाइटर विमानों की तेज़ आवाज़ सुनी जिससे खलबली की स्थिति पैदा हुई. क्या वो नियम तोड़ सीमा पाए आये भारतीय वायु सेना के विमान थे या उनका पीछा कर रहे पाकिस्तानी वायु सेना के विमान?"

इजाज़ उल-हक ने ये ट्वीट भारत-पाकिस्तान बॉर्डर से सटे हारुनाबाद (पाकिस्तान) से किया था जो कि मुल्तान से भी दक्षिण में स्थित है. भारत सरकार ने जिस जगह एयर स्ट्राइक करने का दावा किया है, वहाँ से हारुनाबाद काफ़ी दूर है.

पाकिस्तान के असद नाम के एक ट्विटर यूज़र ने इजाज़ उल-हक के ट्वीट के जवाब में एक अन्य वीडियो पोस्ट किया था. ये वीडियो 25 फ़रवरी की सुबह 1:21 बजे पोस्ट किया गया था, यानी कथित एयर स्ट्राइक के दावे से एक रात पहले.

पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर इस वीडियो को 'पाकिस्तानी वायु सेना की जाबाज़ी' बताकर शेयर किया जा रहा है.

लेकिन ये दोनों वीडियो भारतीय मीडिया में और सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के स्थानीय लोगों के हवाले से 'एयर-स्ट्राइक के वीडियो' बताते हुए देखे-दिखाए जा रहे हैं.

इन दो वायरल वीडियोज़ के अलावा एक तीसरा वीडियो भी है जिसे कई दक्षिणपंथी रुझान रखने वाले फ़ेसबुक ग्रुप्स में, ट्विटर पर, शेयर चैट और व्हॉट्सऐप पर शेयर किया गया है.

इस वायरल वीडियो में कुछ लोग एक पुरानी इमारत के क़रीब भागते हुए दिखाई देते हैं जिन्हें एक फ़ाइटर विमान अपना निशाना बना लेता है.

इस वीडियो के साथ दावा किया जा रहा है कि 'ये वीडियो उनमें से एक मिराज फ़ाइटर प्लेन का है जो पाकिस्तान में एयर-स्ट्राइक के 'ख़ुफ़िया मिशन' में शामिल था'.

जिन लोगों ने इस वीडियो को शेयर किया है, उनका दावा है कि इस हमले में 300 से ज़्यादा चरमपंथी मारे गए हैं.

लेकिन असलियत में ये 'आर्मा-2' नाम के एक वीडियो गेम की रिकॉर्डिंग है.

सैन्य अभियानों पर आधारित इस वीडियो गेम की ये रिकॉर्डिंग 9 जुलाई 2015 को यू-ट्यूब पर पोस्ट की गई थी.

Wednesday, February 20, 2019

बांग्लादेश: इमारतों में आग लगने से 70 की मौत

बांग्लादेश की राजधानी ढाका के एक भीड़भाड़ वाले इलाके में आग लगने की घटना में कम से कम 70 लोगों की मौत हो गई है. करीब 40 लोग बुरी तरह ज़ख्मी हुए हैं.

अग्निशमन सेवा के महानिदेशक अली अहमद ख़ान का कहना है कि हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.

राजधानी के पुराने शहर इलाके के चौक बाज़ार की एक इमारत में सबसे पहले आग लगी थी. ये रिहाइशी इमारत थी जिसमें कैमिकल रखने का एक गोदाम भी था.

देखते देखते आग दूसरी इमारतों में फैल गई. आग पर काबू पाने के लिए अग्निशमन सेवा की करीब 30 गाड़ियां मौक़े पर पहुंची हैं.

बताया जा रहा है कि अब तक 12 शवों को इमारत से निकाला जा चुका है. फ़िलहाल 95 फीसदी आग पर काबू पा लिया गया है.

अली अहमद ख़ान का कहना है कि आग बुझाने के बाद खोज अभियान चलाया जाएगा.

उनका कहना है कि आग लगने का कारणों का अब तक पता नहीं चल पाया है.

"कुछ लोगों का कहना है कि सीएनजी सिलेंडर फटने से आग शुरु हुई लेकिन जांच के बाद ही सही कारणों का पता चल पाएगा."

"वहां प्लास्टिक था, कैमिकल था और इस कारण तेज़ी से आग फैल गई."

जिस तरह पाकिस्तानी अपने मुल्क को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि बाक़ी दुनिया भी पाकिस्तान को वैसे ही देखे. इसी तरह जैसे हिन्दुस्तानी भारत को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि विदेशी भी भारत को इसी दृष्टि से देखें.

जनता की भावनाएं, मीडिया के एक्शन से भरपूर मांगें, नेताओं के मुंह से निकलने वाले झाग अपनी जगह, मगर सरकारों को किसी भी एक्शन या रिएक्शन से पहले दस तरह की और चीज़ें भी सोचनी पड़ती हैं.

अब पुलवामा के घातक हमले को ही ले लें. या इससे पहले पठानकोट और उड़ी की घटना या 2008 के मुंबई हमले या 1993 के मुंबई में दर्जन भर बम विस्फोटों से फैली बर्बादी. सबूत, ताना-बाना और ग़ुस्सा अपनी-अपनी जगह मगर इसके बाद क्या?

युद्ध होना होता तो 13 दिसंबर 2001 को हो जाना चाहिए था जब लोकसभा बिल्डिंग पर चरमपंथी हमला हुआ था.

दो दिन बाद रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से सेना को मार्चिंग ऑर्डर मिल चुके थे. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद पाकिस्तान से मिली सीमा पर भारतीय सेना की ये सबसे बड़ी तैनाती थी.

इस बार भी जब तक ग़ुस्सा ठंडा नहीं हो जाता तब तक चाहें तो सेना को एड़ियों पर खड़ा रखें. चुनाव में पुलवामा को मुद्दे के तौर पर पूरी तरीक़े से सब पार्टियां इस्तेमाल करें.

दोनों देश इस्लामाबाद और दिल्ली से लंबे समय के लिए राजदूत बुलवा लें. आर्थिक व सांस्कृतिक दौरे और तबादले रोक दें. एक-दूसरे के ख़िलाफ़ गुप्त कार्रवाईयां और तेज़ कर दें, मगर फिर- इसके बाद?

चीन हो या रूस या अमरीका या सऊदी अरब या यूरोपीय यूनियन- हर कोई बाक़ी संसार और उसकी मुश्किलों को अपने-अपने हिसाब से देखता है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोस्ती भी मोल-तोल में होती है और दुश्मनी भी गणित के हिसाब से होती है.

इस वक़्त अगर इलाक़े में अफ़ग़ानिस्तान को सुलटाने के लिए अमरीका को पाकिस्तान की ज़रूरत न होती तो अब तक ट्रंप साहब पुलवामा पर कम से कम पांच ट्वीट कर चुके होते.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ये मामला उठाया ज़रूर जा सकता है मगर चीन वीटो कर देगा. सऊदी अरब को जितनी भारत की ज़रूरत है उससे ज़्यादा सऊदी अरब को पाकिस्तान की.

ईरान और भारत मिलकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई मोर्चा बना लें ऐसा नज़र नहीं आता.

क्या भारत को पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए? दिल भले चाह रहा हो पर फ़िलहाल हालात इस क़ाबिल नहीं.

लेकिन, पुलवामा में जो बारूद इस्तेमाल हुआ वो सीमा पार से स्मगल हुआ? जिसने गाड़ी टकराई वो सीमा पार से आया? उसका हैंडलर लोकल था या सीमा की दूसरी तरफ़ बैठा था?

क्या कश्मीर में मिलिटेन्सी आज भी बाहर से कंट्रोल होती है या अब उसका अंदरूनी ढांचा बन चुका है?

और दहश्तगर्दी की भट्टी में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल बलूचिस्तान से कश्मीर तक मुसलसल क्यों पैदा हो रहा है?

इस पर कोई भी सरकार रोक क्यों नहीं लगा पा रही?

सब जानते हैं पर जवाब कौन देगा. दुश्मनी में सबसे पहली लाश सच्चाई की गिरती है- मानो कि ना मानो.

Thursday, February 14, 2019

सर्जिकल स्ट्राइक, ऑपरेशन ऑलआउट, राष्ट्रपति शासन, फिर भी कश्मीर में नहीं रुक रहे हमले

जम्मू-कश्मीर के पुलावामा में सुरक्षा बलों के काफिले पर हुआ आतंकी हमला 18 सितंबर 2016 को उरी सेक्टर में सेना मुख्यालय पर हुए हमले से भी बड़ा हमला बताया जा रहा है. इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली है. उरी में सेना के कैंप पर हुए हमले का बदला लेने के लिए भारतीय सेना ने पाकिस्तान की सीमा में दाखिल होकर सर्जिकल स्ट्राइक की थी. बावजूद इसके सीमा पार से प्रायोजित आतंकी घटनाओं पर लगाम नहीं लगी.

कश्मीर घाटी में सेना का ऑपरेशन ऑल आउट अभियान जारी है. जिसके तहत पिछले तीन साल में सुरक्षा बलों ने पिछले तीन साल में 586 आतंकी मार गिराए हैं. यह जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में राज्यसभा में दी थी. इसके अलावा पाकिस्तान की तरफ से नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन भी होता रहा, लेकिन सेना के जवानों ने उनका मुंह तोड़ जवाब दिया. सीमा पर लगातार मुंह की खा रहे पाकिस्तान ने एक बार फिर साजिशों को अंजाम देना शुरू कर दिया. जिसके तहत सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशें तो तेज हुई ही साथ ही घाटी में युवाओं को भी इस साजिश का हिस्सा बनाया जाने लगा.

बता दें कि कश्मीर की सुरक्षा को खतरा बताते हुए केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पिपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से समर्थन वापस ले लिया था. तब से घाटी में सीधे केंद्र का नियंत्रण है. इसके चलते सुरक्षाबलों द्वारा लगातार आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है. हालांकि सुरक्षाबलों को इसमें कामयाबी भी मिली है. लेकिन इन सबके बावजूद इतनी बड़ी आतंकी घटना होने का मतलब यह है कि आतंकियों के नापाक हौसले कम नहीं हुए हैं.

बताया जा रहा है कि कश्मीर के पुलवामा में जिस सड़क पर यह हमला हुआ वह पिछले कई दिनों से बर्फबारी के कारण बंद थी और कल ही इसे खोला गया था. इस हमले को अंजाम देने के लिए आतंकियों ने सुरक्षाबलों के काफिले के एक वाहन पर आत्मघाती हमला किया. इस काफिले में 50 से ज्यादा वाहन शामिल थे जिसमें 2500 जवान सवार थे. सुरक्षाबलों की इतनी बड़ी मूवमेंट और एजेंसियों के अलर्ट के बावजूद इस हमले का होना सुरक्षा में बहुत बड़ी चूक कहा जा सकता है.

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद यह माना जा रहा था कि पाकिस्तान इससे सीख लेते हुए अपने नापाक मंसूबों पर लगाम लगाएगा. निजाम बदलने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी अमन-ओ-अमान की बात की थी. लेकिन इमरान भी पाकिस्तान की धरती पर आतंकवाद की उपज रोकने में नाकाम रहे. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ठीक 10 दिन पहले 5 फरवरी को कराची में खुले-आम आतंक का आका मौलाना मसूद अजहर का छोटा भाई और जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मौलाना रऊफ असगर रैली करता है और भारत को दहला देने का ऐलान करता है.

साल की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एएनआई को दिए अपने इंटरव्यू में कहा था हम पाकिस्तान से 1965, 1971, कारगिल युद्ध लड़ चुके हैं. एक लड़ाई (सर्जिकल स्ट्राइक) से पाकिस्तान सुधर जाएगा, ये सोचना बहुत बड़ी गलती होगी. पाकिस्तान को सुधरने में अभी और समय लगेगा. बहरहाल पुलवामा में हुए इस बड़े आतंकी हमले से पाकिस्तान एक बार फिर बेनकाब हुआ है तो वहीं देश में सुरक्षा को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा हुआ है.

Thursday, February 7, 2019

法国共产党《人道报》难以为继 右派出手挽救“法国特色”

法国极左派报纸,法国共产党机关报《人道报》(L'Humanité)面临破产威胁,报纸呼吁法国人踊跃订阅,挽救“法兰西的一部分”。

甚至法国的右翼政党也慷慨解囊,加入《人道报》所称的为保住报纸继续发行而进行的“伟大战斗”。

下周,法国的一家法庭将裁决《人道报》是否能继续维持发行,还是宣布破产。

左派喉舌
《人道报》1904年由法国的社会主义领导人饶勒斯(Jean Jaurès)创办。1920年代后,成为法国共产党的机关报。

在第二次世界大战后的法国媒体界,《人道报》曾占有重要的一席之地,是法国左翼政治势力的喉舌,也自视为法国劳苦大众的代言人。

但近几十年来,《人道报》的发行量日渐衰落,从最高时期的50万份到今天的不足3万份。

法国政府给予法国所有的报纸直接及间接的补贴,这个制度使得《人道报》能够维持发行至今。

但是,发行量的持续衰减、广告收入的缩水及出版费用的上涨,使得《人道报》难以为继。

报纸主编雅瑞克( Patrick Le Hyaric)对英国《卫报》表示,《人道报》是法国媒体历史的重要一部分,它代表了法国的工人运动,法国的左派,它也是法兰西共和国、二战抵抗和法国独立运动历史进程的一部分。

雅瑞克称,无论左中右政治光谱,如果《人道报》消失了,法国的一部分、多元的观点以及交锋也会随着消失。

媒体历史学家埃弗诺(Patrick Eveno)同意雅瑞克的看法。埃弗诺对《卫报》说,过去20 多年来的一个共识是,如果《人道报》没了,是观点多元化的一个损失,所以历任法国总统,如希拉克,萨科齐,奥朗德等,都特别拨款资助以保证《人道报》能维持发行。

《人道报》求救的呼吁得到了法国许多知名人士的响应,连右派人物也加入了挽救的努力。

法国右翼政党共和党的迪夫(Julien Dive)不但捐款,而且订阅了《人道报》。他说,《人道报》“充满激情和与众不同”,读者可能不同意它的观点,但能够读到不同的观点是更重要的。

法国《世界报》发表社评,对《人道报》能否生存下去表示担忧,警告失去它将是法国多元媒体和言论自由的损失。

人道报》(L'Humanité)是法国全国发行的日报。《人道报》原为法国共产党中央机关报,现独立运营,但仍是法国共产党的喉舌报纸。

《人道报》迄今已经有114年历史。1904年4月,法国著名工人运动活动家,社会主义者让·饶勒斯(Jean Jaurès)创办该报,作为工人国际法国支部机关报。

1920年工人国际法国支部发生分裂,主张加入共产国际的多数派组成法国共产党,该报随后成为法共机关报。

二次世界大战中德国纳粹占领法国后,转入地下发行的《人道报》宣传法共的“保卫、武装和战斗”政治号召。二战结束后,《人道报》在争取法国政治和经济独立,维护工人和劳动阶层权益等方面起到了重要作用,有相当的影响力,发行量最高时达50万份。