इस बिल में एक बार में तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देने और इसे तोड़नेवाले पति को तीन साल की सज़ा दिए जाने का प्रस्ताव पास किया गया है. लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 245 और विपक्ष में 11 वोट पड़े.
इस बिल को कानून की शक्ल देने के लिए राज्यसभा में पास करवाना होगा.
लोकसभा में तीन तलाक़ बिल पर वोटिंग का कांग्रेस और AIADMK ने बहिष्कार किया. वे इस बिल को विचार के लिए संसद की संयुक्त चयन समिति के पास भेजने की मांग कर रहे थे. विपक्ष इस कानून में सज़ा का प्रावधान रखने का विरोध भी कर रहा था.
विपक्ष की दलील थी कि ये विधेयक सुप्रीम कोर्ट के आदेश और संविधान के ख़िलाफ़ है. ऐसे में इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल हो सकता है.
कांग्रेस समेत ज़्यादातर विपक्षी पार्टियाँ तीन तलाक़ को अपराध क़रार दिए जाने का ये कहते हुए विरोध कर रही हैं कि किसी और धर्म में तलाक़ के मामले में ऐसा नहीं होता.
पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था.
इसके बाद सरकार तीन तलाक़ पर संसद में एक विधेयक लेकर आई.
लोकसभा में ये बिल पास हो गया था मगर राज्यसभा में इसके पारित नहीं होने से इसे क़ानून नहीं बनाया जा सका.
इसके बाद सरकार इसी साल सितंबर महीने में तीन तलाक़ पर अध्यादेश ले आई, जिसे राष्ट्रपति ने भी मंज़ूरी दे दी.
ये अध्यादेश संसद के शीत सत्र शुरू होने के छह हफ़्तों तक मान्य रहता और इसलिए सरकार इससे पहले इसे लोकसभा से पारित करवाना चाहती थी.
तीन तलाक़ कानून में तीन साल जेल का प्रावधान किया गया है.
इसके तहत तीन तलाक़ गैरज़मानती होगा और अभियुक्त को ज़मानत थाने में नहीं दी जा सकती.
सुनवाई से पहले ज़मानत के लिए उसे मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा. यहां पत्नी की सुनवाई के बाद ही पति को ज़मानत मिल सकेगी.
मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि ज़मानत तभी दी जाए जब पति विधेयक के अनुसार पत्नी को मुआवज़ा देने पर सहमत हो. विधेयक के अनुसार मुआवज़े की राशि मजिस्ट्रेट द्वारा तय की जाएगी.
तलाक़-ए-बिद्दत या इंस्टेंट तलाक़ दुनिया के बहुत कम देशों में चलन में है, भारत उन्हीं देशों में से एक है.
एक झटके में तीन बार तलाक़ कहकर शादी तोड़ने को तलाक़-ए-बिद्दत कहते हैं.
ट्रिपल तलाक़ लोग बोलकर, टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए या व्हॉट्सऐप से भी देने लगे हैं.
एक झटके में तीन बार तलाक़ बोलकर शादी तोड़ने का चलन देश भर में सुन्नी मुसलमानों में है लेकिन सुन्नी मुसलमानों के तीन समुदायों ने तीन तलाक़ की मान्यता ख़त्म कर दी है.
हालांकि देवबंद के दारूल उलूम को मानने वाले मुसलमानों में तलाक़-ए-बिद्दत अब भी चलन में है और वे इसे सही मानते हैं.
इस तरीक़े से कितनी मुसलमान महिलाओं को तलाक़ दिया गया इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है.
एक झटके में तीन बार तलाक़ बोलकर शादी तोड़ने का चलन देश भर में सुन्नी मुसलमानों में है लेकिन सुन्नी मुसलमानों के तीन समुदायों ने तीन तलाक़ की मान्यता ख़त्म कर दी है.
हालांकि देवबंद के दारूलउलूम को मानने वाले मुसलमानों में तलाक़-ए-बिद्दत अब भी चलन में है और वे इसे सही मानते हैं.
इस तरीक़े से कितनी मुसलमान महिलाओं को तलाक़ दिया गया इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है.
अगर एक ऑनलाइन सर्वे की बात करें तो एक प्रतिशत से भी कम महिलाओं को इस तरह तलाक़ दिया गया, हालांकि सर्वे का सैम्पल साइज़ बहुत छोटा था.
Thursday, December 27, 2018
Tuesday, December 18, 2018
दिग्विजय सिंह जो 'मिस्टर बंटाधार' से 15 साल बाद बने 'किंग मेकर'
17 दिसंबर को भोपाल में जब कमलनाथ मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने मंच पर पहुंचे तो उनके साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया साथ-साथ थे. दिग्विजय सिंह समारोह में मौजूद तो थे, लेकिन मंच से नीचे.
दिग्विजय मंच के नीचे ज़रूर थे, लेकिन कमलनाथ के शपथ लेने से उनके दिल को ही सबसे ज़्यादा ठंडक पहुंची होगी और इसकी एक नहीं दो वजह हैं.
पहली वजह तो यही है कि बीते 15 साल से राज्य में कांग्रेस की खस्ता हालत के लिए उन्हें ही लगातार ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा था. कांग्रेस की जीत से दिग्विजय को 15 साल की बदनामी के दौर से उबरने में मदद मिलेगी.
दूसरी वजह है एक पुराना क़र्ज़, जिसे उन्होंने अब चुकाया है.
पहले बात बदनामी वाले दौर की. दरअसल 15 साल पहले, 2003 में जब दिग्विजिय सिंह, 10 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बाद चुनाव हारे थे, तब तक उनका नाम 'मिस्टर बंटाधार' के तौर पर मशहूर हो चुका था. 2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान दिग्विजय सिंह को ये नाम उमा भारती ने दिया था, जो चुनाव जीतकर बाद में राज्य की मुख्यमंत्री भी बनी थीं.
उनकी पहचान ऐसे नेता की बन चुकी थी जिसने मध्य प्रदेश के लोगों का बंटाधार कर दिया. प्रदेश में बिजली, सड़क और पानी को लेकर आम लोगों में 2003 में इतनी नाराज़गी थी कि वो आने वाले दस सालों तक ख़त्म नहीं हुई थी.
उस हार से दिग्विजय सिंह इतने आहत हुए थे कि उन्होंने 10 साल तक सार्वजनिक जीवन से एक तरह का संन्यास ले लिया था, 10 साल तक वे सक्रिय राजनीति से दूर रहे लेकिन उन्हें 2003 की हार सालती रही थी.
भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश के लोगों की नाराजगी को देखते हुए 2008 और 2013 में राज्य के चुनाव को शिवराज बनाम दिग्विजय सिंह की लड़ाई के तौर पर पेश किया था. शिवराज सिंह ने 2013 में भी यही कोशिश की, लेकिन इस बार कांग्रेस की रणनीति ने उन्हें विपक्ष में बैठा दिया.
परदे के पीछे से रणनीति
पार्टी आलाकमान ने दिग्विजय सिंह के चेहरे को पीछे करते हुए राज्य के अपने दो बड़े नेताओं कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को सामने कर दिया. दिग्विजय पीछे ज़रूर थे, लेकिन परदे के पीछे रणनीति बनाने में उनका अहम योगदान रहा.
दिग्विजय सिंह के छोटे भाई और कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा के लिए चुने गए लक्ष्मण सिंह कहते हैं, "मध्य प्रदेश की जीत में तीनों का अहम योगदान रहा है, किसी का कम और किसी का ज़्यादा करके देखना ठीक नहीं होगा. दरअसल जिन्हें जो भूमिका दी गई थी, उसे उन लोगों ने बख़ूबी निभाया."
लक्ष्मण सिंह जीत के लिए दिग्विजिय-कमलनाथ-ज्योतिरादित्य की तिकड़ी को बराबरी का श्रेय दे रहे हैं लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वालों की मानें तो इस बार दिग्विजय सिंह 'किंग मेकर' की भूमिका में रहे हैं.
राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "दिग्विजय सिंह भले मंच पर नहीं दिखे हों लेकिन परदे के पीछे सबसे अहम योगदान उनका ही रहा है. रणनीतिक तौर पर उन्होंने अपने काम को ओवरप्ले नहीं किया लेकिन पूरे राज्य में कांग्रेस को उन्होंने ही मुक़ाबले में लाने का काम किया है."
दरअसल, चुनाव से कई महीने पहले उन्होंने 192 दिनों तक, यानी छह महीने से भी लंबे समय तक नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा करके राज्य में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को नए उत्साह से भर दिया था. 3,300 किलोमीटर की यात्रा के दौरान करीब 140 विधानसभा क्षेत्रों में दिग्विजय सिंह ने कवर किया था.
इस यात्रा के बारे में दिग्विजय सिंह ने चुनाव से पहले बीबीसी को बताया था, "छह महीने की नर्मदा परिक्रमा यात्रा के तहत मुझसे ढेरों लोग मिले, किसान, व्यापारी, ब्यूरोक्रेट्स, हर वर्ग का आदमी बेहद दुखी है, सब नाराज़ हैं. कमलनाथ जी रणनीति बना रहे हैं, हम लोग मिलकर चुनाव लड़ेंगे और सरकार बनाएंगे."
दिग्विजय मंच के नीचे ज़रूर थे, लेकिन कमलनाथ के शपथ लेने से उनके दिल को ही सबसे ज़्यादा ठंडक पहुंची होगी और इसकी एक नहीं दो वजह हैं.
पहली वजह तो यही है कि बीते 15 साल से राज्य में कांग्रेस की खस्ता हालत के लिए उन्हें ही लगातार ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा था. कांग्रेस की जीत से दिग्विजय को 15 साल की बदनामी के दौर से उबरने में मदद मिलेगी.
दूसरी वजह है एक पुराना क़र्ज़, जिसे उन्होंने अब चुकाया है.
पहले बात बदनामी वाले दौर की. दरअसल 15 साल पहले, 2003 में जब दिग्विजिय सिंह, 10 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बाद चुनाव हारे थे, तब तक उनका नाम 'मिस्टर बंटाधार' के तौर पर मशहूर हो चुका था. 2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान दिग्विजय सिंह को ये नाम उमा भारती ने दिया था, जो चुनाव जीतकर बाद में राज्य की मुख्यमंत्री भी बनी थीं.
उनकी पहचान ऐसे नेता की बन चुकी थी जिसने मध्य प्रदेश के लोगों का बंटाधार कर दिया. प्रदेश में बिजली, सड़क और पानी को लेकर आम लोगों में 2003 में इतनी नाराज़गी थी कि वो आने वाले दस सालों तक ख़त्म नहीं हुई थी.
उस हार से दिग्विजय सिंह इतने आहत हुए थे कि उन्होंने 10 साल तक सार्वजनिक जीवन से एक तरह का संन्यास ले लिया था, 10 साल तक वे सक्रिय राजनीति से दूर रहे लेकिन उन्हें 2003 की हार सालती रही थी.
भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश के लोगों की नाराजगी को देखते हुए 2008 और 2013 में राज्य के चुनाव को शिवराज बनाम दिग्विजय सिंह की लड़ाई के तौर पर पेश किया था. शिवराज सिंह ने 2013 में भी यही कोशिश की, लेकिन इस बार कांग्रेस की रणनीति ने उन्हें विपक्ष में बैठा दिया.
परदे के पीछे से रणनीति
पार्टी आलाकमान ने दिग्विजय सिंह के चेहरे को पीछे करते हुए राज्य के अपने दो बड़े नेताओं कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को सामने कर दिया. दिग्विजय पीछे ज़रूर थे, लेकिन परदे के पीछे रणनीति बनाने में उनका अहम योगदान रहा.
दिग्विजय सिंह के छोटे भाई और कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा के लिए चुने गए लक्ष्मण सिंह कहते हैं, "मध्य प्रदेश की जीत में तीनों का अहम योगदान रहा है, किसी का कम और किसी का ज़्यादा करके देखना ठीक नहीं होगा. दरअसल जिन्हें जो भूमिका दी गई थी, उसे उन लोगों ने बख़ूबी निभाया."
लक्ष्मण सिंह जीत के लिए दिग्विजिय-कमलनाथ-ज्योतिरादित्य की तिकड़ी को बराबरी का श्रेय दे रहे हैं लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वालों की मानें तो इस बार दिग्विजय सिंह 'किंग मेकर' की भूमिका में रहे हैं.
राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "दिग्विजय सिंह भले मंच पर नहीं दिखे हों लेकिन परदे के पीछे सबसे अहम योगदान उनका ही रहा है. रणनीतिक तौर पर उन्होंने अपने काम को ओवरप्ले नहीं किया लेकिन पूरे राज्य में कांग्रेस को उन्होंने ही मुक़ाबले में लाने का काम किया है."
दरअसल, चुनाव से कई महीने पहले उन्होंने 192 दिनों तक, यानी छह महीने से भी लंबे समय तक नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा करके राज्य में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को नए उत्साह से भर दिया था. 3,300 किलोमीटर की यात्रा के दौरान करीब 140 विधानसभा क्षेत्रों में दिग्विजय सिंह ने कवर किया था.
इस यात्रा के बारे में दिग्विजय सिंह ने चुनाव से पहले बीबीसी को बताया था, "छह महीने की नर्मदा परिक्रमा यात्रा के तहत मुझसे ढेरों लोग मिले, किसान, व्यापारी, ब्यूरोक्रेट्स, हर वर्ग का आदमी बेहद दुखी है, सब नाराज़ हैं. कमलनाथ जी रणनीति बना रहे हैं, हम लोग मिलकर चुनाव लड़ेंगे और सरकार बनाएंगे."
Friday, December 14, 2018
बार सांसद, 3 बार विधायक और 2 बार मुख्यमंत्री रहे अशोक बने राजस्थान के नए मुख्यमंत्री
5 बार सांसद, 2 बार मुख्यमंत्री और 3 बार विधायक बने अशोक गहलोत को एक बार फिर राज्य की कमान सौंप दी गई है। यानि राज्य के नए सम्राट अशोक ही होंगे इस सस्पेंस से अब पर्दा उठ चुका है। नतीजों के बाद तीन दिनों तक चले वार्ता के दौर के बाद आखिरकार आलाकमान ने अपने फैसले का ऐलान कर ही दिया और अब अशोक मुख्यमंत्री तो सचिन पायलट डिप्टी सीएम होंगे। सीएम पद की रेस में पहले दिन से ही गहलोत आगे चल रहे थे और आखिरकार उन्होने ये रेस जीत भी ली। औपचारिक ऐलान कर दिया गया है। 67 साल के हो चुके अशोक गहलोत राज्य के नए मुख्ममंत्री बनने जा रहे हैं। आइए जानते हैं कैसा रहा है राजस्थान के तीसरी बार सीएम बनने जा रहे हैं अशोक गहलोत का सियासी सफर
ऐसे हुई राजनीति में एंट्री
कहा जाता है कि अशोक गहलोत को विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति और समाजसेवा से जुड़े कार्यों में रूचि थी। यही कारण रहा कि वो इस ओर आकर्षित हुए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गहलोत को राजनीति में लाने वालीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। जी हां...पूर्वोत्तर क्षेत्र में शरणार्थियों के बीच अच्छा काम कर रहे गहलोत से इंदिरा काफी प्रभावित थीं। इसलिए वो उन्हे राजनीति में लाई। बस तब से शुरू हुई गहलोत का सियासी सफर आज तक जारी है।
1980 में बने पहली बार सांसद
अशोक गहलोत 7वीं लोकसभा के लिए साल 1980 में पहली बार जोधपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद बनें। उसके बाद जोधपुर संसदीय क्षेत्र से ही उन्होने 8वीं लोकसभा, 10वीं लोकसभा, 11वीं लोकसभा और 12वीं लोकसभा का चुनाव जीता।
1999 में चुने गए विधायक
1999 में अशोक गहलोत सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र से ही विधायक चुने गए जिसके बाद 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में भी गहलोत विधायक के तौर पर चुन कर आएं।
2 बार बन चुके हैं मुख्यमंत्री
अशोक गहलोत सबसे पहले 1998 में मुख्यमंत्री चुने गए थे। इनका कार्यकाल 2003 तक चला। इसके बाद बीजेपी की सरकार राज्य में बनीं लेकिन 2008 के चुनाव में जब फिर कांग्रेस की वापसी हुई एक बार फिर अशोर गहलोत को ही राज्य की कमान सौंप दी गई। और अब वो तीसरा बार राज्य के सीएम बनने जा रहे हैं।
ऐसे हुई राजनीति में एंट्री
कहा जाता है कि अशोक गहलोत को विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति और समाजसेवा से जुड़े कार्यों में रूचि थी। यही कारण रहा कि वो इस ओर आकर्षित हुए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गहलोत को राजनीति में लाने वालीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। जी हां...पूर्वोत्तर क्षेत्र में शरणार्थियों के बीच अच्छा काम कर रहे गहलोत से इंदिरा काफी प्रभावित थीं। इसलिए वो उन्हे राजनीति में लाई। बस तब से शुरू हुई गहलोत का सियासी सफर आज तक जारी है।
1980 में बने पहली बार सांसद
अशोक गहलोत 7वीं लोकसभा के लिए साल 1980 में पहली बार जोधपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद बनें। उसके बाद जोधपुर संसदीय क्षेत्र से ही उन्होने 8वीं लोकसभा, 10वीं लोकसभा, 11वीं लोकसभा और 12वीं लोकसभा का चुनाव जीता।
1999 में चुने गए विधायक
1999 में अशोक गहलोत सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र से ही विधायक चुने गए जिसके बाद 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में भी गहलोत विधायक के तौर पर चुन कर आएं।
2 बार बन चुके हैं मुख्यमंत्री
अशोक गहलोत सबसे पहले 1998 में मुख्यमंत्री चुने गए थे। इनका कार्यकाल 2003 तक चला। इसके बाद बीजेपी की सरकार राज्य में बनीं लेकिन 2008 के चुनाव में जब फिर कांग्रेस की वापसी हुई एक बार फिर अशोर गहलोत को ही राज्य की कमान सौंप दी गई। और अब वो तीसरा बार राज्य के सीएम बनने जा रहे हैं।
Thursday, November 22, 2018
50 प्रतिशत एटीएम क्यों हैं बंद होने की कगार पर?
एटीएम उद्योग का प्रतिनिधित्व करनेवाले संघ CATMi का कहना है कि 2019 मार्च तक मुल्क की 50 फ़ीसद से ज़्यादा ऑटोमेटेड टेलर मशीनें काम करना बंद कर सकती हैं.
मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ इस वक़्त मुल्क में 2,38,000 एटीएम काम कर रहे हैं.
इसका मतलब ये हो सकता है कि फिर से बैंकों और एटीएम के सामने उसी तरह की लंबी क़तारें देखने को मिल सकती हैं जैसे नोटबंदी के बाद हुई थी.
सरकार के नए नियमों के मुताबिक़ आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़ों की सब्सिडी का पैसा सीधे बैंक खातों में जाता है जिसकी वजह से ऐसे लोगों की निर्भरता एटीएम सेवाओं पर बढ़ी है और इन मशीनों के बंद होने का सबसे अधिक असर उन्हीं पर होगा.
क़स्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी डेबिट और क्रेडिट कार्ड्स बहुत अधिक इस्तेमाल में नहीं लाए जाते.
संस्था के डायरेक्टर के श्रीनिवास ने बीबीसी से कहा कि सरकार और आरबीआई के नए नियमों के बाद पहले से ही नुक़सान में चल रहा एटीएम उद्योग और अधिक दबाव में आ जाएगा जिसके नतीजे क़स्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में पड़ने वाले क़रीब 1.13 लाख एटीएम पर बंद होने का ख़तरा मंडरा रहा है.
हम जिस ऑटोमेटेड टेलर मशीनों में डेबिट/क्रेडिट कार्ड्स डालकर मिनटों में हज़ारों के कैश निकाल लेते हैं उसकी एक व्यापक टेक्नालॉजी और उद्योग है जिसमें एटीएम मशीन बनाने, लगाने, चलाने वाली कंपनियों से लेकर मशीन में कैश डालने वाली कंपनियां, लोग और एटीएम बॉक्स के पास बैठे गार्ड्स तक शामिल हैं.
आपके आसपास जो एटीएम काम कर रहे हैं वो सब एक जैसे नहीं, कम से व्यापारिक दृष्टि से.
आपका वास्ता जिन एटीएम से होता है वो तीन तरह के होते हैं:
1. बैंकों के अपने एटीएम जिसकी देखभाल या तो वो ख़ुद करते हैं या फिर ऐसी कंपनियों को दे देते हैं जो एटीएम से जुड़े सारे काम देखती है.
2. बैंक एटीएम मुहैया करवाने वाली कंपनी को ठेका देकर ज़रूरत के मुताबिक़ मशीनें लगवाती हैं जिसमें हर ट्रांज़ैक्शन के बदले बैंक को कमीशन देना होता है.
उपर के दोनों तरह के मॉडल में मशीन में कैश डलवाना बैंक की ज़िम्मेदारी होती है.
3. आरबीआई ने साल 2013 में कुछ कंपनियों को लाइसेंस दिया है कि वो अपने हिसाब से एटीएम मशीनें लगाकर बैंकों को एटीएम सेवा मुहैया करवाएं, जिसके बदले उन्हें कमीशन या एटीएम इंटरचेंज फ़ीस मिलती है.
मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ इस वक़्त मुल्क में 2,38,000 एटीएम काम कर रहे हैं.
इसका मतलब ये हो सकता है कि फिर से बैंकों और एटीएम के सामने उसी तरह की लंबी क़तारें देखने को मिल सकती हैं जैसे नोटबंदी के बाद हुई थी.
सरकार के नए नियमों के मुताबिक़ आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़ों की सब्सिडी का पैसा सीधे बैंक खातों में जाता है जिसकी वजह से ऐसे लोगों की निर्भरता एटीएम सेवाओं पर बढ़ी है और इन मशीनों के बंद होने का सबसे अधिक असर उन्हीं पर होगा.
क़स्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी डेबिट और क्रेडिट कार्ड्स बहुत अधिक इस्तेमाल में नहीं लाए जाते.
संस्था के डायरेक्टर के श्रीनिवास ने बीबीसी से कहा कि सरकार और आरबीआई के नए नियमों के बाद पहले से ही नुक़सान में चल रहा एटीएम उद्योग और अधिक दबाव में आ जाएगा जिसके नतीजे क़स्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में पड़ने वाले क़रीब 1.13 लाख एटीएम पर बंद होने का ख़तरा मंडरा रहा है.
हम जिस ऑटोमेटेड टेलर मशीनों में डेबिट/क्रेडिट कार्ड्स डालकर मिनटों में हज़ारों के कैश निकाल लेते हैं उसकी एक व्यापक टेक्नालॉजी और उद्योग है जिसमें एटीएम मशीन बनाने, लगाने, चलाने वाली कंपनियों से लेकर मशीन में कैश डालने वाली कंपनियां, लोग और एटीएम बॉक्स के पास बैठे गार्ड्स तक शामिल हैं.
आपके आसपास जो एटीएम काम कर रहे हैं वो सब एक जैसे नहीं, कम से व्यापारिक दृष्टि से.
आपका वास्ता जिन एटीएम से होता है वो तीन तरह के होते हैं:
1. बैंकों के अपने एटीएम जिसकी देखभाल या तो वो ख़ुद करते हैं या फिर ऐसी कंपनियों को दे देते हैं जो एटीएम से जुड़े सारे काम देखती है.
2. बैंक एटीएम मुहैया करवाने वाली कंपनी को ठेका देकर ज़रूरत के मुताबिक़ मशीनें लगवाती हैं जिसमें हर ट्रांज़ैक्शन के बदले बैंक को कमीशन देना होता है.
उपर के दोनों तरह के मॉडल में मशीन में कैश डलवाना बैंक की ज़िम्मेदारी होती है.
3. आरबीआई ने साल 2013 में कुछ कंपनियों को लाइसेंस दिया है कि वो अपने हिसाब से एटीएम मशीनें लगाकर बैंकों को एटीएम सेवा मुहैया करवाएं, जिसके बदले उन्हें कमीशन या एटीएम इंटरचेंज फ़ीस मिलती है.
Monday, November 12, 2018
इस भारतीय ने FB में ढूंढी खामी, कंपनी ने दिए 1.10 लाख रुपये
सोशल मीडिया दिग्गज फेसबुक में आए दिन बग (खामियां) निकलती हैं. फेसबुक बग ढूंढने में भारतीय काफी आगे हैं. फेसबुक बग बाउंटी प्रोग्राम के तहत इन्हें इनाम देता है.
मुंबई के रहने वाले शुभम ने हाल ही में फेसबुक की खामी को उजागर किया और इसके लिए कंपनी ने उसे रिवॉर्ड दिया है. इतना ही नहीं इस 2018 के हॉल ऑफ फेम में शुभम को जगह भी दी जाएगी. फेसबुक ने शुभम को 1,500 डॉलर (लगभग 1,10,000 रुपये) दिए हैं.
क्या था बग
शुभम ने फेसबुक पेज में बग ढूंढा है. फेसबुक पेज के ऐडमिन रोल प्राइवेट होते हैं. लेकिन शुभम ने फेसबुक ग्रुप के जरिए पेज के एडमिन का नाम जान सकते थे. ये बग प्राइवेसी के लिहाज से काफी गंभीर हो साबित हो सकता था. किस पेज का एडमिन कौन है ये जानकारी सामने आना खुद में एक समस्या है.
शुभम के मुताबिक यह प्राइवेसी से जुड़ी खामी थी और इसका फायदा उठा कर किसी भी पेज के एडमिन की जानकारी और उसके पर्सनल प्रोफाइल को देखा जा सकता था. गौरतलब है कि फेसबुक पेज में एडमिन को प्राइवेट रखने का ऑप्शन होता है और ज्यादातर पेज के एडमिन्स प्राइवेट होते हैं ताकि यूजर्स उनका प्रोफाइल न देख सकें.
आपको बता दें कि शुभम के अलावा भी कई भारतीय ने फेसबुक में बग ढूंढकर करोड़ों रुपये कमाए हैं. ऐसे ही बंगलुरु के आनंद प्रकाश इस फेसबुक बग ढूंढने वाले में दुनिया के मामले में नंबर-1 रह चुके हैं.
शुभम में आजतक को बताया है कि वो फेसबुक के इस रिवॉर्ड से काफी खुश और उत्साहित हैं और वो फेसबुक के अलवा दूसरे प्लेटफॉर्म पर भी बग ढूंढते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ साल से वो फेसबुक में बग ढूंढना चाहते थे.
शुभम 21 साल के हैं और उन्होंने ने बीसीए किया है और अब वो पीजी कर रहे हैं.
वहीं भोपाल से बीजेपी सांसद आलोक संजर ने कहा कि आरएसएस की शाखाएं मैदानों में लगती है या फिर संघ की अपनी सम्पत्तियों में ना कि शासकीय भवनों में. संजर ने कहा कि आरएसएस की शाखाओं में राष्ट्रवाद सिखाया जाता है और वह कांग्रेस को याद दिलाना चाहते हैं कि देश मे कोई भी आपदा आती है तो सबसे पहले RSS का स्वयंसेवक वहां पहुंचता है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एमपी कांग्रेस के इस वादे का समर्थन किया है. चिदंबरम ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है. उन्होंने कहा, " आरएसएस एक राजनीतिक संस्था है, यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो कांग्रेस ने घोषणा पत्र में कहा है कि सरकारी इमारतों में संघ की शाखाओं को बंद कर दिया जाएगा, मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता है, सरकारी कर्मचारी जब तक नौकरी कर रहे हैं तबतक उन्हें खुले रूप से किसी भी राजनीतिक दल के साथ नहीं आना चाहिए."
मुंबई के रहने वाले शुभम ने हाल ही में फेसबुक की खामी को उजागर किया और इसके लिए कंपनी ने उसे रिवॉर्ड दिया है. इतना ही नहीं इस 2018 के हॉल ऑफ फेम में शुभम को जगह भी दी जाएगी. फेसबुक ने शुभम को 1,500 डॉलर (लगभग 1,10,000 रुपये) दिए हैं.
क्या था बग
शुभम ने फेसबुक पेज में बग ढूंढा है. फेसबुक पेज के ऐडमिन रोल प्राइवेट होते हैं. लेकिन शुभम ने फेसबुक ग्रुप के जरिए पेज के एडमिन का नाम जान सकते थे. ये बग प्राइवेसी के लिहाज से काफी गंभीर हो साबित हो सकता था. किस पेज का एडमिन कौन है ये जानकारी सामने आना खुद में एक समस्या है.
शुभम के मुताबिक यह प्राइवेसी से जुड़ी खामी थी और इसका फायदा उठा कर किसी भी पेज के एडमिन की जानकारी और उसके पर्सनल प्रोफाइल को देखा जा सकता था. गौरतलब है कि फेसबुक पेज में एडमिन को प्राइवेट रखने का ऑप्शन होता है और ज्यादातर पेज के एडमिन्स प्राइवेट होते हैं ताकि यूजर्स उनका प्रोफाइल न देख सकें.
आपको बता दें कि शुभम के अलावा भी कई भारतीय ने फेसबुक में बग ढूंढकर करोड़ों रुपये कमाए हैं. ऐसे ही बंगलुरु के आनंद प्रकाश इस फेसबुक बग ढूंढने वाले में दुनिया के मामले में नंबर-1 रह चुके हैं.
शुभम में आजतक को बताया है कि वो फेसबुक के इस रिवॉर्ड से काफी खुश और उत्साहित हैं और वो फेसबुक के अलवा दूसरे प्लेटफॉर्म पर भी बग ढूंढते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ साल से वो फेसबुक में बग ढूंढना चाहते थे.
शुभम 21 साल के हैं और उन्होंने ने बीसीए किया है और अब वो पीजी कर रहे हैं.
वहीं भोपाल से बीजेपी सांसद आलोक संजर ने कहा कि आरएसएस की शाखाएं मैदानों में लगती है या फिर संघ की अपनी सम्पत्तियों में ना कि शासकीय भवनों में. संजर ने कहा कि आरएसएस की शाखाओं में राष्ट्रवाद सिखाया जाता है और वह कांग्रेस को याद दिलाना चाहते हैं कि देश मे कोई भी आपदा आती है तो सबसे पहले RSS का स्वयंसेवक वहां पहुंचता है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एमपी कांग्रेस के इस वादे का समर्थन किया है. चिदंबरम ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है. उन्होंने कहा, " आरएसएस एक राजनीतिक संस्था है, यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो कांग्रेस ने घोषणा पत्र में कहा है कि सरकारी इमारतों में संघ की शाखाओं को बंद कर दिया जाएगा, मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता है, सरकारी कर्मचारी जब तक नौकरी कर रहे हैं तबतक उन्हें खुले रूप से किसी भी राजनीतिक दल के साथ नहीं आना चाहिए."
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