Sunday, January 27, 2019

आप कह रहे हों थम्स अप, दूसरा समझे ठेंगा: वुसअत का ब्लॉग

दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में वनडे मैच के दौरान पाकिस्तान के कप्तान सरफ़राज़ अहमद ने दक्षिण अफ्रीका के ऑलराउंडर एंडाइल पेलुकवायो की धुंआधार बल्लेबाज़ी पर झल्लाकर कहा- 'अबे काले, तेरी मां आज कहां बैठी है, क्या पढ़वाकर आय़ा है तू.'

मुझे यक़ीन है कि सरफ़राज़ को पता तक न चला होगा कि यह नस्लभेदी जुमला है और इस पर हंगामा भी हो सकता है. सरफ़राज़ बेचारा तो अपने अंदाज़ में एंडाइल पेलुकवायो की बल्लेबाज़ी की तारीफ़ करना चाह रहा था.

जब हरभजन सिंह ने 2007 में सिडनी टेस्ट में ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एंड्रू साइमंड्स को तूतू-मैंमैं के दौरान बंदर कहा और जुर्माना भी भरा, तब हरभजन के भी दिमाग़ में न होगा कि किसी को बंदर कहना ऐसी बात है कि इसपर इतना शोर मच सकता है.

मसला यह है कि दक्षिण एशिया के कल्चर में हम जिस माहौल में पलते-बढ़ते हैं, वहां गाली और अपमान के पैमाने ज़ाहिर है कि दूसरी संस्कृतियों से अलग हैं.

मसलन हमारे माहौल में काला-कलूटा, काला भुजंग, कलुआ या 'जितने भी काले, सब मेरे बाप के साले' जैसे शब्दों और जुमलों को हंसकर टाल दिया जाता है. मगर अन्य देशों में यही बातें किसी को भी लाल-पीला कर सकती हैं.

हम जातिवाद और भेदभाव से अटे जिस समाज में पलकर बड़े होते हैं, वहां हमें अहसास तक नहीं होता कि हमारे जिस रवैये के भले कोई मायने न हों, उन्हें बाक़ी दुनिया शायद कबूल न करे.

फिर हमारे रवैये पर प्रतिक्रिया होती है तो हम सोचने लगते हैं कि ऐसा क्या कह दिया कि इनके तन-बदन में आग लग गई.

हम दक्षिण एशिया के मर्द जब खुश होते हैं तो बेतकल्लुफी में एक-दूसरे को गालियां देते हुए गले मिलते हैं. मज़ाक करते हैं तो उसमें अश्लील इशारे यारी की निशानी समझे जाते हैं. गुस्से में होने पर भी इन्हीं हरकतों और शब्दों से काम लिया जाता है.

इसमें कुछ भी हमारे नज़दीक अश्लीलता के दायरे में नहीं आता. बहुत से लोगों के लिए अंगूठा दिखाने का मतलब हौसला अफ़ज़ाई या ख़ुशी का इज़हार है मगर करोड़ों ऐसे भी हैं जिनके लिए अंगूठा दिखाना ठेंगा दिखाने के बराबर है.

इसी तरह बहुत से समाजों में किसी अजनबी को आंख मारना इंतहां बदतमीज़ी की बात है मगर कई समाजों में इसे गर्मजोशी ज़ाहिर करने की निशानी समझा जाता है.

हमारे यहां मर्द का मर्द से गले मिलना जफ़्फ़ी (झप्पी) कहलाता है मगर यूरोप और अमरीका की सड़कों पर यही जफ़्फ़ी राहगीरों की आंखें गोल-गोल घुमाने का कारण बन सकती है. शायद वो आपको वो समझ रहे हों जो आप न हों.

लिहाज़ा यह बहुत ज़रूरी है कि जो लोग का या सैर-सपाटे के लिए बाहर जाना चाहते हैं, उन्हें कोई अच्छी टूरिस्ट गाइड भी खरीद लेनी चाहिए ताकि इशारों और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बारे में पहले से कुछ जानकारी हो जाए और वे शर्मिंदगी का सामना करने से बच सकें.

वैसे भी, आपने सुना तो होगा- व्हेन इन रोम, डू ऐज़ द रोमन्स डू. इस मुहावरे को समझने और समझकर अमल करने की भी ज़रूरत है.

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