बांग्लादेश की राजधानी ढाका के एक भीड़भाड़ वाले इलाके में आग लगने की घटना में कम से कम 70 लोगों की मौत हो गई है. करीब 40 लोग बुरी तरह ज़ख्मी हुए हैं.
अग्निशमन सेवा के महानिदेशक अली अहमद ख़ान का कहना है कि हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.
राजधानी के पुराने शहर इलाके के चौक बाज़ार की एक इमारत में सबसे पहले आग लगी थी. ये रिहाइशी इमारत थी जिसमें कैमिकल रखने का एक गोदाम भी था.
देखते देखते आग दूसरी इमारतों में फैल गई. आग पर काबू पाने के लिए अग्निशमन सेवा की करीब 30 गाड़ियां मौक़े पर पहुंची हैं.
बताया जा रहा है कि अब तक 12 शवों को इमारत से निकाला जा चुका है. फ़िलहाल 95 फीसदी आग पर काबू पा लिया गया है.
अली अहमद ख़ान का कहना है कि आग बुझाने के बाद खोज अभियान चलाया जाएगा.
उनका कहना है कि आग लगने का कारणों का अब तक पता नहीं चल पाया है.
"कुछ लोगों का कहना है कि सीएनजी सिलेंडर फटने से आग शुरु हुई लेकिन जांच के बाद ही सही कारणों का पता चल पाएगा."
"वहां प्लास्टिक था, कैमिकल था और इस कारण तेज़ी से आग फैल गई."
जिस तरह पाकिस्तानी अपने मुल्क को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि बाक़ी दुनिया भी पाकिस्तान को वैसे ही देखे. इसी तरह जैसे हिन्दुस्तानी भारत को देखते हैं, ज़रूरी तो नहीं कि विदेशी भी भारत को इसी दृष्टि से देखें.
जनता की भावनाएं, मीडिया के एक्शन से भरपूर मांगें, नेताओं के मुंह से निकलने वाले झाग अपनी जगह, मगर सरकारों को किसी भी एक्शन या रिएक्शन से पहले दस तरह की और चीज़ें भी सोचनी पड़ती हैं.
अब पुलवामा के घातक हमले को ही ले लें. या इससे पहले पठानकोट और उड़ी की घटना या 2008 के मुंबई हमले या 1993 के मुंबई में दर्जन भर बम विस्फोटों से फैली बर्बादी. सबूत, ताना-बाना और ग़ुस्सा अपनी-अपनी जगह मगर इसके बाद क्या?
युद्ध होना होता तो 13 दिसंबर 2001 को हो जाना चाहिए था जब लोकसभा बिल्डिंग पर चरमपंथी हमला हुआ था.
दो दिन बाद रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से सेना को मार्चिंग ऑर्डर मिल चुके थे. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद पाकिस्तान से मिली सीमा पर भारतीय सेना की ये सबसे बड़ी तैनाती थी.
इस बार भी जब तक ग़ुस्सा ठंडा नहीं हो जाता तब तक चाहें तो सेना को एड़ियों पर खड़ा रखें. चुनाव में पुलवामा को मुद्दे के तौर पर पूरी तरीक़े से सब पार्टियां इस्तेमाल करें.
दोनों देश इस्लामाबाद और दिल्ली से लंबे समय के लिए राजदूत बुलवा लें. आर्थिक व सांस्कृतिक दौरे और तबादले रोक दें. एक-दूसरे के ख़िलाफ़ गुप्त कार्रवाईयां और तेज़ कर दें, मगर फिर- इसके बाद?
चीन हो या रूस या अमरीका या सऊदी अरब या यूरोपीय यूनियन- हर कोई बाक़ी संसार और उसकी मुश्किलों को अपने-अपने हिसाब से देखता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोस्ती भी मोल-तोल में होती है और दुश्मनी भी गणित के हिसाब से होती है.
इस वक़्त अगर इलाक़े में अफ़ग़ानिस्तान को सुलटाने के लिए अमरीका को पाकिस्तान की ज़रूरत न होती तो अब तक ट्रंप साहब पुलवामा पर कम से कम पांच ट्वीट कर चुके होते.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ये मामला उठाया ज़रूर जा सकता है मगर चीन वीटो कर देगा. सऊदी अरब को जितनी भारत की ज़रूरत है उससे ज़्यादा सऊदी अरब को पाकिस्तान की.
ईरान और भारत मिलकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई मोर्चा बना लें ऐसा नज़र नहीं आता.
क्या भारत को पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए? दिल भले चाह रहा हो पर फ़िलहाल हालात इस क़ाबिल नहीं.
लेकिन, पुलवामा में जो बारूद इस्तेमाल हुआ वो सीमा पार से स्मगल हुआ? जिसने गाड़ी टकराई वो सीमा पार से आया? उसका हैंडलर लोकल था या सीमा की दूसरी तरफ़ बैठा था?
क्या कश्मीर में मिलिटेन्सी आज भी बाहर से कंट्रोल होती है या अब उसका अंदरूनी ढांचा बन चुका है?
और दहश्तगर्दी की भट्टी में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल बलूचिस्तान से कश्मीर तक मुसलसल क्यों पैदा हो रहा है?
इस पर कोई भी सरकार रोक क्यों नहीं लगा पा रही?
सब जानते हैं पर जवाब कौन देगा. दुश्मनी में सबसे पहली लाश सच्चाई की गिरती है- मानो कि ना मानो.
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